सुप्रीम कोर्ट में मंदिर पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन पुनरीक्षण का मुद्दा उठा। न्यायिक आयोग गठन की मांग पर सुनवाई हुई।

सुप्रीम कोर्ट में मंदिर पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन पुनरीक्षण को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में न्यायिक आयोग गठित कर मंदिर कर्मचारियों की वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की समीक्षा की मांग की गई है। अदालत ने मामले को गंभीर बताते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े मंदिरों की बढ़ती आय के बावजूद कई पुजारी और कर्मचारी सीमित मानदेय पर काम कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में मंदिर पुजारियों के वेतन का मुद्दा गूंजा, न्यायिक आयोग गठन की मांग तेज

नई दिल्ली, एजेंसी। देशभर के मंदिरों में कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन तथा सेवा सुविधाओं का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिका में मंदिरों के पुजारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन पुनरीक्षण के लिए न्यायिक आयोग गठित करने की मांग उठाई गई है। याचिका में कहा गया है कि कई राज्यों में मंदिरों की आय करोड़ों रुपये में होने के बावजूद वहां कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों को बेहद कम मानदेय पर काम करना पड़ रहा है, जिससे उनका जीवन प्रभावित हो रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान इस विषय को गंभीर बताते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत में यह भी दलील दी गई कि मंदिरों में कार्यरत हजारों कर्मचारी सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति अपेक्षित स्तर तक मजबूत नहीं हो पाई है।

मंदिर पुजारियों के वेतन पुनरीक्षण की मांग क्यों बढ़ी

याचिका में कहा गया कि देश के अनेक मंदिरों में पुजारी और कर्मचारी वर्षों से सीमित वेतन पर कार्य कर रहे हैं। कई स्थानों पर उन्हें नियमित वेतन, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधा और सामाजिक सुरक्षा तक उपलब्ध नहीं है। मंदिर प्रशासन और सरकारी नियंत्रण वाले धार्मिक संस्थानों की आय बढ़ने के बावजूद कर्मचारियों के हितों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

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विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और दक्षिण भारत के कई बड़े मंदिरों में आय का स्तर काफी ऊंचा है, लेकिन छोटे और मध्यम स्तर के मंदिरों में सेवा देने वाले पुजारियों की आर्थिक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मथुरा, वृंदावन और हरिद्वार जैसे धार्मिक क्षेत्रों में भी यह मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक आयोग गठन की मांग

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई कि मंदिरों की आय, कर्मचारियों की संख्या और उनकी सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग गठित किया जाए। आयोग यह तय करे कि मंदिर कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन, भविष्य निधि, बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं किस प्रकार उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

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याचिकाकर्ताओं का कहना है कि देशभर में मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था अलग-अलग राज्यों में भिन्न है, जिसके कारण कर्मचारियों को समान सुविधाएं नहीं मिल पातीं। कई राज्यों में मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं, जबकि कुछ स्थानों पर निजी ट्रस्ट संचालन करते हैं। इसी असमानता के कारण वेतन और सुविधाओं में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

धार्मिक संस्थानों की आर्थिक व्यवस्था पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान धार्मिक संस्थानों की आय और उसके उपयोग को लेकर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े मंदिरों में चढ़ावे और दान से भारी आय होती है, लेकिन उसका पारदर्शी और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। अदालत में यह तर्क भी रखा गया कि यदि मंदिरों की आय का एक निर्धारित हिस्सा कर्मचारियों के कल्याण पर खर्च किया जाए तो हजारों परिवारों को सीधा लाभ मिल सकता है।

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दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों में त्योहारों और विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इससे मंदिरों की आय बढ़ती है, लेकिन सेवा देने वाले कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि अब यह विषय कानूनी और सामाजिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।

पुजारियों और कर्मचारियों ने फैसले से जताई उम्मीद

मंदिरों से जुड़े कई संगठनों और कर्मचारियों ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद उनकी समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस पहल हो सकती है। उनका कहना है कि धार्मिक सेवा से जुड़े लोग समाज के आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार हैं, इसलिए उनके जीवन स्तर और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में कोई व्यापक दिशा-निर्देश जारी करती है तो इससे देशभर के धार्मिक संस्थानों में कर्मचारियों की सेवा शर्तों को लेकर नई व्यवस्था लागू हो सकती है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट में मंदिर पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन पुनरीक्षण का मुद्दा उठना देशभर के धार्मिक संस्थानों की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह मामला केवल वेतन वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन और धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में अदालत की टिप्पणी और संभावित दिशा-निर्देश लाखों मंदिर कर्मचारियों के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।

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