सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल भाइयों के बीच संपत्ति का बंटवारा कर देने से बेटियों का कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता की बिना वसीयत मृत्यु होने पर बेटियां भी प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी हैं। यह निर्णय हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या को और स्पष्ट करता है तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर समेत देशभर में चल रहे संपत्ति विवादों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
बेटियों के संपत्ति अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, भाइयों के बीच बंटवारे से खत्म नहीं होगा हक
नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के संपत्ति अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल भाइयों के बीच संपत्ति का बंटवारा कर देने से बेटियों का कानूनी अधिकार समाप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो बेटियां भी प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी हैं और उन्हें संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलेगा।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देशभर, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा क्षेत्र में पारिवारिक संपत्ति विवादों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अदालत ने साफ किया कि पुराने बंटवारे का हवाला देकर बेटियों को अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में वर्ष 2005 में हुए संशोधन का उद्देश्य बेटियों को समान अधिकार देना था। अदालत के अनुसार, यदि पिता की संपत्ति बिना वसीयत के छोड़ी गई है, तो बेटियां भी पुत्रों के समान हिस्सेदारी की हकदार होंगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2004 से पहले भाइयों के बीच किया गया बंटवारा स्वतः ही बेटियों के अधिकार को समाप्त नहीं कर देता। यदि बेटियां उस बंटवारे का हिस्सा नहीं थीं या उनके अधिकारों की अनदेखी की गई, तो वे अदालत में दावा कर सकती हैं।
संपत्ति विवादों पर फैसले का बड़ा असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय देशभर में चल रहे हजारों पारिवारिक संपत्ति विवादों को प्रभावित करेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, गाजियाबाद, नोएडा, बुलंदशहर और बागपत जैसे क्षेत्रों में संयुक्त परिवारों की संपत्तियों को लेकर अक्सर विवाद सामने आते रहे हैं। कई मामलों में बेटियों को पारिवारिक समझौते या मौखिक बंटवारे के आधार पर हिस्सेदारी से अलग रखा जाता था।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद ऐसे मामलों में बेटियां पुनः अपने अधिकार का दावा कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य महिलाओं को बराबरी देना है, न कि उन्हें पारिवारिक प्रक्रियाओं के नाम पर अधिकारों से दूर करना।
2005 संशोधन को लेकर अदालत की महत्वपूर्ण व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(5) केवल पुराने वैध बंटवारों को संरक्षण देती है, लेकिन यह बेटियों के मौलिक उत्तराधिकार अधिकार को खत्म नहीं करती।
अदालत के अनुसार, धारा 8 के तहत बेटी पहले से ही प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी है। इसलिए यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो पुत्री का अधिकार स्वतः उत्पन्न होता है। इसे किसी तकनीकी आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
महिलाओं के अधिकारों को लेकर न्यायपालिका का लगातार सख्त रुख
पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। वर्ष 2020 के चर्चित निर्णय में भी अदालत ने कहा था कि बेटी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखती है।
अब ताजा फैसले ने यह संदेश और मजबूत कर दिया है कि परिवार के भीतर किए गए एकतरफा समझौते या केवल पुत्रों के बीच बंटवारा बेटियों के वैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकते। इससे ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में महिलाओं की कानूनी स्थिति मजबूत होने की संभावना है।
समाज और परिवारों पर संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले के बाद परिवारों में संपत्ति के दस्तावेज तैयार करते समय अधिक पारदर्शिता बरतनी होगी। अब केवल मौखिक समझौते या सीमित पारिवारिक सहमति पर्याप्त नहीं मानी जाएगी।
दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से बढ़ती जमीन की कीमतों के कारण पैतृक संपत्तियों के विवाद बढ़े हैं। ऐसे में यह फैसला महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही इससे परिवारों को कानूनी प्रक्रिया का पालन करने और सभी उत्तराधिकारियों को शामिल करने की आवश्यकता भी बढ़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बेटियों के संपत्ति अधिकारों को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि भाइयों के बीच किया गया बंटवारा बेटियों के वैधानिक अधिकार को खत्म नहीं कर सकता। यह निर्णय न केवल महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देगा, बल्कि पारिवारिक संपत्ति विवादों में न्याय और समानता की दिशा में भी बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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