मेरठ पराग डेयरी कॉन्क्लेव में हंगामा: पूर्व और वर्तमान अध्यक्ष के समर्थकों के बीच जमकर चले लात-घूंसे
मेरठ में आयोजित पराग डेयरी कॉन्क्लेव उस समय अखाड़े में तब्दील हो गया जब पूर्व और वर्तमान अध्यक्ष के समर्थकों के बीच वर्चस्व की जंग शुरू हो गई। देखते ही देखते कार्यक्रम स्थल पर लात-घूंसे चलने लगे और अफरा-तफरी मच गई। यह विवाद डेयरी प्रबंधन और स्थानीय राजनीति के बीच के गहरे मतभेदों को उजागर करता है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सका, लेकिन इस घटना ने सहकारिता क्षेत्र की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
मेरठ पराग डेयरी कॉन्क्लेव में हंगामा: पूर्व और वर्तमान अध्यक्ष के समर्थकों के बीच जमकर चले लात-घूंसे
मेरठ, यूपी आज लाइव प्रतिनिधि। मेरठ में सहकारिता और दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया पराग डेयरी कॉन्क्लेव बुधवार को आपसी गुटबाजी की भेंट चढ़ गया। कार्यक्रम के दौरान पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान अध्यक्ष के समर्थकों के बीच तीखी नोकझोंक के बाद हिंसक झड़प हो गई, जिससे पूरे आयोजन में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
मंच के नीचे वर्चस्व की जंग और हिंसक टकराव
पराग डेयरी द्वारा आयोजित इस भव्य कॉन्क्लेव की शुरुआत तो शांतिपूर्ण ढंग से हुई थी, लेकिन जैसे ही मंच से संबोधन और चर्चा का दौर आगे बढ़ा, वर्तमान और पूर्व प्रबंधन के समर्थकों के बीच पुरानी रंजिश सतह पर आ गई। चश्मदीदों के अनुसार, विवाद की शुरुआत एक-दूसरे के विरुद्ध की गई नारेबाजी से हुई, जो कुछ ही मिनटों में शारीरिक संघर्ष में बदल गई। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कुर्सियां इधर-उधर फेंकी जाने लगीं और समर्थकों के बीच जमकर लात-घूंसे चले। इस हंगामे के कारण कार्यक्रम में मौजूद अन्य अतिथि और दुग्ध उत्पादक अपनी जान बचाकर सुरक्षित स्थानों की ओर भागते नजर आए।
स्थानीय राजनीति और डेयरी प्रबंधन का अंतर्विरोध
मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में डेयरी राजनीति हमेशा से ही रसूख का केंद्र रही है। पराग डेयरी के इस कॉन्क्लेव में हुआ विवाद केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि सहकारिता क्षेत्र में गहरे पैठ जमा चुके राजनीतिक गुटों के बीच की खाई को दर्शाता है। वर्तमान अध्यक्ष के समर्थकों का आरोप है कि पूर्व पदाधिकारी कार्यक्रम में व्यवधान डालने की योजना बनाकर आए थे, जबकि विपक्षी खेमे ने इसे वर्तमान प्रबंधन की तानाशाही और कुप्रबंधन का नतीजा बताया है। इस टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली-एनसीआर से सटे इस महत्वपूर्ण जिले में सहकारिता संस्थाएं अब केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बनती जा रही हैं।
सुरक्षा व्यवस्था की विफलता और पुलिस का हस्तक्षेप
इतने बड़े स्तर के आयोजन में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। हंगामा बढ़ने के काफी देर बाद स्थानीय पुलिस मौके पर पहुँची और स्थिति को संभालने का प्रयास किया। पुलिस अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर अलग किया, लेकिन तब तक कार्यक्रम की रूपरेखा पूरी तरह बिगड़ चुकी थी। प्रशासन अब कार्यक्रम स्थल के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रहा है ताकि हिंसा की शुरुआत करने वाले उपद्रवियों की पहचान की जा सके। प्राथमिक रिपोर्ट के अनुसार, कई लोगों को मामूली चोटें आई हैं और आयोजकों द्वारा मामले की लिखित शिकायत देने की तैयारी की जा रही है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दुग्ध उत्पादकों पर प्रभाव
इस हंगामे का सबसे नकारात्मक प्रभाव उन प्रगतिशील किसानों और दुग्ध उत्पादकों पर पड़ा है, जो डेयरी क्षेत्र की नई तकनीकों और सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने दूर-दराज के गांवों से मेरठ आए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी महत्वपूर्ण संस्था के भीतर इस तरह की गुटबाजी सार्वजनिक रूप से सामने आती है, तो इससे न केवल संस्था की छवि धूमिल होती है, बल्कि दुग्ध उत्पादकों का सहकारिता प्रणाली से विश्वास भी डगमगाने लगता है। आगामी दुग्ध समिति चुनावों से पहले इस तरह की हिंसक घटनाएं क्षेत्र में तनाव और बढ़ा सकती हैं।
मेरठ पराग डेयरी कॉन्क्लेव में हुई यह घटना सहकारिता के मूल सिद्धांतों के पतन का संकेत है। जहां ऐसे मंचों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने और दुग्ध क्रांति पर चर्चा के लिए होना चाहिए था, वहां व्यक्तिगत अहंकार और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता हावी रही। यदि शासन और प्रशासन ने समय रहते डेयरी प्रबंधन के भीतर की इस गुटबाजी को शांत नहीं किया, तो इसका सीधा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए सुरक्षा और प्रोटोकॉल के सख्त नियमों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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