सुप्रीम कोर्ट: सेंट्रल मार्केट में 'जिंदगी की कीमत पर नहीं चलेगा व्यापार', 859 संपत्तियों पर चलेगा बुलडोजर
सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में 859 अवैध संपत्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश देते हुए प्रशासन को फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य सेटबैक में किया गया अवैध निर्माण किसी भी सूरत में वैध नहीं होगा। सील की गई संपत्तियों में स्कूल, अस्पताल और बैंक शामिल होने पर कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई और कहा कि व्यवसाय किसी की जान की कीमत पर नहीं चल सकता। प्रशासन अब दो महीने के भीतर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करेगा।
सुप्रीम कोर्ट: सेंट्रल मार्केट में 'जिंदगी की कीमत पर नहीं चलेगा व्यापार', 859 संपत्तियों पर चलेगा बुलडोजर
मेरठ, यूपी आज लाइव प्रतिनिधि। सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ में अवैध निर्माण के खिलाफ अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाते हुए 859 संपत्तियों के अवैध सेटबैक को दो महीने के भीतर ध्वस्त करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि व्यवसाय चलाने की आड़ में आम जनता, मासूम बच्चों और मरीजों की जान को जोखिम में नहीं डाला जा सकता, इसलिए सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त हंटर
मेरठ में अवैध निर्माण और अनिवार्य सेटबैक के उल्लंघन के मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने प्रशासन को आईना दिखाया है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि कानून का राज किसी के शोर-शराबे या व्यापारिक लाभ के आगे नहीं झुक सकता। कोर्ट ने मेरठ की 859 चिन्हित संपत्तियों में किए गए अवैध कब्जों को हटाने के लिए 60 दिनों की समय सीमा निर्धारित की है। यह आदेश केवल मेरठ के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के उन बिल्डरों और व्यवसायियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो नियमों को ताक पर रखकर निर्माण कार्य करते हैं।
स्कूलों और अस्पतालों के संचालन पर गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि सील की गई 44 संपत्तियों में 6 स्कूल, 6 अस्पताल और बैंक संचालित हो रहे थे, तो पीठ ने यूपी आवास एवं विकास परिषद के अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि बिना वैध अनुमति और सुरक्षा मानकों के ऐसी इमारतों में शिक्षण संस्थान और चिकित्सालय चलाने की इजाजत आखिर किसने दी? अदालत ने साफ किया कि मासूम बच्चों और मरीजों की सुरक्षा उनके लिए प्राथमिकता है और किसी भी व्यावसायिक गतिविधि को मानव जीवन से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सेटबैक के उल्लंघन को वैध करना असंभव
अक्सर देखा जाता है कि लोग जुर्माना या कंपाउंडिंग फीस भरकर अवैध निर्माण को वैध कराने की कोशिश करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अनिवार्य खाली जगह यानी सेटबैक में किए गए निर्माण को किसी भी स्थिति में नियमित (Regularize) नहीं किया जा सकता। प्रशासन को आदेश दिया गया है कि वे पहले कब्जाधारकों को नोटिस देकर 10 से 15 दिन का समय दें और यदि वे स्वयं अवैध हिस्सा नहीं हटाते हैं, तो बुलडोजर चलाकर ध्वस्तीकरण सुनिश्चित किया जाए।
ध्वस्तीकरण का खर्च वसूलने और भविष्य की कार्रवाई के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल निर्माण गिराने का आदेश दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया में आने वाला समस्त खर्च प्रशासन उन्हीं अवैध कब्जाधारकों से वसूलेगा। इसके साथ ही, आवास एवं विकास परिषद को अगली सुनवाई से पहले एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करना होगा, जिसमें सीलिंग की कार्रवाई से पहले और बाद की तस्वीरें (Photographs) शामिल होनी चाहिए। कोर्ट ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि उनकी पिछली लापरवाहियों के कारण ही समस्या इतनी विकराल हुई है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय शहरी नियोजन और जन सुरक्षा की दृष्टि से एक मील का पत्थर साबित होगा। मेरठ में होने वाली यह बड़ी कार्रवाई यह संदेश देती है कि विकास के नाम पर नियमों की बलि नहीं दी जा सकती। जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि प्रशासन ने कोर्ट के आदेशों का कितनी निष्ठा से पालन किया है। फिलहाल, इस आदेश से मेरठ के व्यापारियों और अवैध निर्माण करने वालों में हड़कंप मच गया है, लेकिन आम नागरिकों ने सुरक्षा के लिहाज से इसे एक जरूरी कदम बताया है।

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