मेरठ में आयोजित सातवीं भगवान परशुराम शौर्य यात्रा के दौरान पुलिस ने कार्यकर्ताओं से प्रतीकात्मक फरसे जब्त कर लिए थे। राष्ट्रीय परशुराम परिषद के अध्यक्ष अजय भारद्वाज और पूर्व राज्यमंत्री सुनील भराला के विरोध और हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने इन प्रतीकों को ससम्मान वापस कर दिया है। संगठन ने इसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान बताया है और अब इन शस्त्रों का शुद्धिकरण कर पुनः वितरण किया जाएगा।
ब्राह्मण समाज के लोग पत्रकारों से वार्ता करते हुए। फोटोः यूपी आज लाइव।
मेरठ न्यूज़: पुलिस द्वारा जब्त 'फरसे' ससम्मान वापस, राष्ट्रीय परशुराम परिषद ने जताई कड़ी आपत्ति
मेरठ, यूपी आज लाइव प्रतिनिधि। मेरठ में सातवीं भगवान परशुराम शौर्य यात्रा के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा जब्त किए गए धार्मिक प्रतीकों को भारी विरोध के बाद ससम्मान वापस कर दिया गया है। राष्ट्रीय परशुराम परिषद ने इसे आस्था की जीत बताते हुए स्पष्ट किया है कि धार्मिक परंपराओं और शस्त्रों के अपमान को समाज स्वीकार नहीं करेगा।
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धार्मिक यात्रा और पुलिसिया कार्रवाई का घटनाक्रम
मेरठ की सड़कों पर आयोजित सातवीं भगवान परशुराम शौर्य यात्रा के दौरान उस समय विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई जब पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं के पास मौजूद प्रतीकात्मक फरसों को जब्त कर लिया। यह यात्रा चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से प्रारंभ होकर गांधी आश्रम तक निर्धारित थी। यात्रा के मार्ग में पुलिस अधिकारियों द्वारा की गई इस अचानक कार्रवाई से कार्यकर्ताओं में भारी रोष व्याप्त हो गया। राष्ट्रीय परशुराम परिषद के अध्यक्ष अजय भारद्वाज ने इस घटना पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यह केवल एक अस्त्र नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत में भगवान परशुराम का विशेष स्थान है, ऐसे में इस प्रकार का अवरोध स्थानीय भावनाओं को आहत करने वाला सिद्ध हुआ।
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आस्था के प्रतीक और वैधानिक अधिकारों की बहस
इस पूरे प्रकरण में राष्ट्रीय परशुराम परिषद के अध्यक्ष ने एक प्रेस वार्ता के माध्यम से प्रशासनिक रवैये पर तीखे सवाल खड़े किए। अजय भारद्वाज के अनुसार, फरसा भगवान शिव द्वारा प्रदत्त अस्त्र है और इसे केवल शस्त्र के रूप में देखना संकुचित दृष्टिकोण है। उन्होंने तर्क दिया कि शांतिपूर्ण धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार के प्रतीकों का प्रयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब दिल्ली-एनसीआर और मेरठ के विभिन्न हिंदू संगठनों ने इस कार्रवाई के विरोध में सुर मिलाना शुरू किया। संगठन का कहना है कि वे सदैव शांतिपूर्ण कार्यक्रमों और कानून व्यवस्था का सम्मान करते हैं, परंतु जब बात अधिकारों के हनन और धार्मिक प्रतीकों के निरादर की आती है, तो वे पीछे नहीं हटेंगे।
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राजनीतिक हस्तक्षेप और शुद्धिकरण की प्रक्रिया
विवाद की गंभीरता को देखते हुए पूर्व राज्यमंत्री सुनील भराला ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से विस्तृत वार्ता की। उच्चाधिकारियों के निर्देश के पश्चात मेडिकल थाना पुलिस ने जब्त किए गए सभी फरसे ससम्मान संगठन को वापस सौंप दिए। अजय भारद्वाज ने बताया कि पुलिस कस्टडी में रहने के कारण इन धार्मिक प्रतीकों की पवित्रता को लेकर अब इनका विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ शुद्धिकरण किया जाएगा। इसके उपरांत ही इन्हें पुनः कार्यकर्ताओं को वितरित किया जाएगा। इस घटना ने प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक नजीर पेश की है कि धार्मिक आयोजनों में संवेदनशीलता बरतना अनिवार्य है।
मेरठ की यह घटना प्रशासन और धार्मिक संगठनों के बीच समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यद्यपि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य है, लेकिन उसे धार्मिक भावनाओं और आस्था के प्रतीकों के साथ संतुलन बिठाकर कार्य करना चाहिए। फरसों की ससम्मान वापसी ने फिलहाल तनाव को शांत कर दिया है, परंतु भविष्य के आयोजनों के लिए यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि आस्था के अपमान पर कड़ा रुख अपनाया जाएगा।

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