मेरठ: परतापुर थाने में 'गमला फरमान' से मचा हड़कंप, फरियादियों की पार्किंग बंद कर सजाए गए पौधे
मेरठ, यूपी आज लाइव प्रतिनिधि। मेरठ के परतापुर थाने में क्षेत्राधिकारी (सीओ) के एक नए और अजीबोगरीब 'गमला फरमान' के बाद फरियादियों के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है। थाने के भीतर जहां पहले आम जनता के वाहन खड़े होते थे, वहां अब गमले रखकर पार्किंग पूरी तरह बंद कर दी गई है, जिससे पीड़ित बाहर सड़क पर बैठने को मजबूर हैं।
परतापुर थाने में पार्किंग व्यवस्था का बदला स्वरूप
मेरठ के परतापुर थाने के भीतर मंगलवार से एक नई व्यवस्था लागू की गई है, जिसके तहत परिसर में आम जनता और फरियादियों के वाहनों के प्रवेश पर अघोषित पाबंदी लगा दी गई है। क्षेत्राधिकारी ब्रह्मपुरी के निर्देश पर थाने के उस हिस्से में मिट्टी के बड़े-बड़े गमले रखवा दिए गए हैं, जो पहले आगंतुकों की पार्किंग के लिए इस्तेमाल होता था। अब इस स्थान को केवल पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है। परिसर के भीतर एसएसआई, थाना प्रभारी, चौकी इंचार्ज से लेकर होमगार्ड तक के लिए अलग-अलग स्लॉट निर्धारित कर दिए गए हैं, लेकिन न्याय की गुहार लेकर आने वाली जनता के लिए कोई जगह शेष नहीं बची है।
फरियादियों की बढ़ी मुश्किलें और पुलिस का सख्त रुख
इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद अपनी शिकायत लेकर आने वाले बुजुर्गों और महिलाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जब कुछ फरियादियों ने अपनी मोटरसाइकिलें परिसर के अंदर खड़ी करने की कोशिश की, तो ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उन्हें तुरंत बाहर जाने का निर्देश दे दिया। आलम यह है कि लोग अपनी गाड़ियां बाहर असुरक्षित छोड़कर थाने के मुख्य द्वार के पास बनी स्लैब पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। तैनात कर्मचारियों का कहना है कि यह उच्चाधिकारियों का आदेश है और परिसर की सुंदरता बनाए रखने के लिए आम लोगों के वाहन अब अंदर खड़े नहीं होने दिए जाएंगे।
आगंतुक कक्ष की बदहाली और पूर्व के विवाद
हैरानी की बात यह है कि थाने में लगभग एक दशक पहले फरियादियों के बैठने के लिए बनाया गया आगंतुक कक्ष (विजिटर रूम) भी अब जनता के काम नहीं आ रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस कक्ष पर अब पुलिसकर्मियों ने अपना कब्जा जमा लिया है, जिसके कारण पीड़ितों को धूप और धूल में बाहर ही खड़ा रहना पड़ता है। गौरतलब है कि संबंधित सीओ पहले भी अपने कुछ फैसलों को लेकर चर्चा में रही हैं। इससे पूर्व थानों में मीडिया कर्मियों के वीडियो बनाने पर प्रतिबंध लगाने जैसे कथित आदेशों के कारण भी उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठे थे, जिस पर बाद में वरिष्ठ अधिकारियों को हस्तक्षेप करना पड़ा था।
प्रशासनिक निर्णय का प्रभाव और जन आक्रोश
पुलिस प्रशासन के इस निर्णय से स्थानीय निवासियों और फरियादियों में गहरा रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है कि पुलिस का काम जनता की सेवा करना है, न कि उन्हें थाने की दहलीज से बाहर बैठने पर मजबूर करना। सुरक्षित पार्किंग न होने के कारण बाहर से वाहन चोरी होने का डर भी बना रहता है। इस 'गमला फरमान' के चलते पुलिस और जनता के बीच की खाई और चौड़ी होती दिख रही है। सूत्रों की मानें तो कुछ सामाजिक संगठनों ने इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से शिकायत करने का मन बना लिया है।
निष्कर्ष
किसी भी सरकारी कार्यालय, विशेषकर थाने में प्रथम प्राथमिकता वहां आने वाले पीड़ितों की सुविधा होनी चाहिए। परतापुर थाने में सुंदरता के नाम पर गमले रखकर फरियादियों का रास्ता रोकना या उनकी सुविधा छीनना प्रशासनिक संवेदनहीनता का परिचायक है। पुलिस विभाग को चाहिए कि वह अनुशासन और सौंदर्यीकरण के बीच ऐसा संतुलन बनाए जिससे आम नागरिक को अपमानित महसूस न होना पड़े। उम्मीद है कि उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर जल्द ही कोई जनहितैषी समाधान निकालेंगे।

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