मेरठ नगर निगम भ्रष्टाचार मामला: घटिया निर्माण सामग्री के उपयोग पर पार्षद की मुख्यमंत्री से शिकायत, जांच के घेरे में 'जीत कंस्ट्रक्शन'

मेरठ के वार्ड 61 के पार्षद वीरेंद्र शर्मा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर 'सीएम ग्रिड योजना' के तहत सड़क निर्माण में हो रहे भ्रष्टाचार की पोल खोली है। उन्होंने आरोप लगाया कि ठेकेदार 'जीत कंस्ट्रक्शन' द्वारा घटिया सामग्री का उपयोग किया जा रहा है और बार-बार शिकायत के बावजूद नगर निगम के अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं। पार्षद ने साक्ष्यों के साथ उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। 

मेरठ नगर निगम भ्रष्टाचार मामला: घटिया निर्माण सामग्री के उपयोग पर पार्षद की मुख्यमंत्री से शिकायत, जांच के घेरे में 'जीत कंस्ट्रक्शन'

मेरठ, यूपी आज लाइव प्रतिनिधि। मेरठ के वार्ड संख्या 61 के पार्षद वीरेंद्र शर्मा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर नगर निगम के अंतर्गत हो रहे सड़क निर्माण कार्यों में भारी भ्रष्टाचार और घटिया सामग्री के उपयोग का आरोप लगाया है। यह मामला मेरठ के गढ़ रोड से आरटीओ कार्यालय होते हुए हापुड़ रोड तक 'सीएम ग्रिड योजना' के तहत किए जा रहे चौड़ीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ा है, जिसमें संबंधित कार्यदायी संस्था के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई है।

मेरठ सीएम ग्रिड योजना में भ्रष्टाचार की छाया और विकास की गुणवत्ता पर सवाल

उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी 'सीएम ग्रिड योजना' का उद्देश्य शहरों की सड़कों को आधुनिक और सुदृढ़ बनाना है, लेकिन मेरठ में इस योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। वार्ड संख्या 61 के पार्षद वीरेंद्र शर्मा ने आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय को सूचित किया है कि वार्ड संख्या 61, 26 और 53 के क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण, डिवाइडर निर्माण, नाला और फुटपाथ बनाने का कार्य निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं किया जा रहा है। पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि कार्यदायी संस्था 'जीत कंस्ट्रक्शन' द्वारा निर्माण कार्य में अत्यंत निम्न स्तर की सामग्री का उपयोग किया जा रहा है, जो न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग है, बल्कि भविष्य में नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा बन सकता है।

इस शिकायत की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्षद ने इसे केवल मौखिक रूप में नहीं रखा, बल्कि आधुनिक साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किया है। पत्र के अनुसार, मौके पर हो रहे निर्माण कार्यों की वीडियो बनाकर नगर निगम के मुख्य अभियंता और क्षेत्रीय अवर अभियंता को उनके व्हाट्सएप पर भेजी गई थी। इसके बावजूद, विभागीय अधिकारियों द्वारा अब तक संबंधित ठेकेदार या संस्था के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया गया है। यह प्रशासनिक उदासीनता इस ओर संकेत करती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें शायद स्थानीय स्तर पर कहीं गहरे जमी हुई हैं, जिसे मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बिना उखाड़ पाना संभव नहीं लग रहा है।

स्थानीय निवासियों पर प्रभाव और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता का सामाजिक गणित

जब किसी सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण में घटिया ईंटों, मिलावटी सीमेंट या कमजोर सरियों का उपयोग होता है, तो उसका सीधा प्रभाव आम जनता के जीवन और उनकी जेब पर पड़ता है। मेरठ के इन प्रमुख वार्डों के निवासी जो लंबे समय से बेहतर सड़कों और जल निकासी की प्रतीक्षा कर रहे थे, उनके लिए यह निर्माण एक उम्मीद के बजाय भविष्य की त्रासदी बन सकता है। यदि सड़क और नाले का निर्माण मानकों के अनुसार नहीं होता है, तो पहली ही बारिश में जलभराव और सड़कों के टूटने की स्थिति पैदा हो जाएगी। इससे न केवल यातायात बाधित होगा, बल्कि बार-बार होने वाले सड़क हादसों की आशंका भी बढ़ जाएगी।

इस पूरे प्रकरण में लाभ और हानि के गणित को समझना भी अनिवार्य है। वर्तमान में, इसका प्रत्यक्ष लाभ भ्रष्ट ठेकेदारों और उन अधिकारियों को मिल रहा है जो गुणवत्ता से समझौता कर सरकारी बजट का बड़ा हिस्सा अपनी जेब में डाल रहे हैं। इसके विपरीत, सबसे बड़ी हानि उन करदाताओं की है जिनके पैसे का दुरुपयोग हो रहा है। यदि यह सड़क छह महीने भी नहीं टिक पाती है, तो सरकार को पुनः मरम्मत के लिए बजट आवंटित करना पड़ेगा, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। मेरठ जैसे तेजी से विकसित होते शहर के लिए यह स्थिति बहुत चिंताजनक है क्योंकि यह न केवल शहर के विकास की गति को रोकता है, बल्कि निवेश और सुगम जीवन के दावों की भी पोल खोलता है।

प्रशासनिक उत्तरदायित्व और भविष्य की कार्ययोजना की आवश्यकता

पार्षद वीरेंद्र शर्मा का यह पत्र प्रशासन की पारदर्शिता पर एक बड़े प्रहार के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने अपनी शिकायत की प्रतियां मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन, प्रमुख सचिव नगर विकास विभाग और आयुक्त मेरठ मंडल को भी भेजी हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे इस मामले को तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। भविष्य में इसके परिणाम काफी व्यापक हो सकते हैं। यदि मुख्यमंत्री कार्यालय इस पर त्वरित संज्ञान लेते हुए उच्च स्तरीय जांच बैठाता है, तो नगर निगम के कई वरिष्ठ अधिकारी और ठेकेदार इसकी चपेट में आ सकते हैं। यह कार्रवाई भविष्य के अन्य निर्माण कार्यों के लिए भी एक चेतावनी का कार्य करेगी।

मेरठ का स्थानीय संदर्भ देखा जाए तो शहर में पहले भी कई बार सड़कों के टूटने और जलभराव की समस्याएं उठती रही हैं। गढ़ रोड और हापुड़ रोड जैसे व्यस्ततम इलाकों में यदि निर्माण कार्य अधूरा या त्रुटिपूर्ण रहता है, तो इसका असर पूरे शहर की व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियों पर पड़ता है। शासन को चाहिए कि वह केवल कागजी रिपोर्टों पर भरोसा न कर, स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट के माध्यम से इन कार्यों की भौतिक जांच कराए। डिजिटल साक्ष्यों को नजरअंदाज करना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने जैसा है। अब सबकी नजरें लखनऊ से आने वाले आदेशों पर टिकी हैं कि क्या जीत कंस्ट्रक्शन जैसे ठेकेदारों पर नकेल कसी जाएगी या यह मामला भी फाइलों के ढेर में कहीं दबकर रह जाएगा।

निष्कर्ष

मेरठ में सीएम ग्रिड योजना के अंतर्गत हो रहे कार्यों में भ्रष्टाचार की शिकायत केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास का उल्लंघन है। पार्षद द्वारा मुख्यमंत्री को सीधे पत्र लिखना स्थानीय स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र की विफलता को दर्शाता है। भ्रष्टाचार के इस दीमक को खत्म करने के लिए दोषियों के विरुद्ध कठोरतम विभागीय और विधिक कार्रवाई आवश्यक है ताकि भविष्य में कोई भी निर्माण एजेंसी सरकारी मानकों के साथ खिलवाड़ करने का साहस न कर सके। पारदर्शी शासन के लिए यह अनिवार्य है कि विकास कार्यों में गुणवत्ता ही सर्वोपरि हो, अन्यथा 'स्मार्ट सिटी' का सपना केवल एक कागजी जुमला बनकर रह जाएगा।

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