ईरान-अमेरिका युद्धविराम: पाकिस्तान और चीन की मध्यस्थता से थमा संघर्ष, क्या ट्रंप ने तेहरान के सामने किया सरेंडर?


ईरान-अमेरिका युद्धविराम: पाकिस्तान और चीन की मध्यस्थता से थमा संघर्ष, क्या ट्रंप ने तेहरान के सामने किया सरेंडर?

वॉशिंगटन/इस्लामाबाद/तेहरान, एजेंसी। पश्चिम एशिया में हफ्तों से जारी भीषण तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। इस समझौते को धरातल पर उतारने के लिए पाकिस्तान, चीन, मिस्र और तुर्की जैसे देशों ने पर्दे के पीछे से बड़ी मध्यस्थता की है। विशेष रूप से चीन की सक्रिय भूमिका और पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की अमेरिकी प्रशासन के साथ सीधी बातचीत ने इस संघर्ष विराम की राह आसान की है। हालांकि, इस समझौते की शर्तों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिका ने ईरान की ताकत के आगे घुटने टेक दिए हैं।

चीन और पाकिस्तान की निर्णायक मध्यस्थता

इस ऐतिहासिक युद्धविराम के पीछे कूटनीतिक गलियारों में बड़ी हलचल देखने को मिली। सूत्रों के अनुसार, ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार चीन ने तेहरान को इस बात के लिए राजी किया कि युद्ध का विस्तार किसी के हित में नहीं है। चीन ने मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के साथ मिलकर एक मजबूत गुट तैयार किया। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच हुई कई दौर की टेलीफोनिक बातचीत ने इस गतिरोध को तोड़ने में सेतु का काम किया। जेडी वेंस ने ही अंततः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध के मैदान से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने के लिए तैयार किया।

क्या यह अमेरिका का कूटनीतिक सरेंडर है?

युद्धविराम के मसौदे और वर्तमान जमीनी हकीकत का विश्लेषण करें तो पलड़ा ईरान की ओर झुकता नजर आ रहा है। अमेरिका और इजरायल का प्राथमिक लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना और उसके परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना था, लेकिन ये दोनों ही उद्देश्य अधूरे रह गए हैं। ईरान का शासन न केवल सुरक्षित है, बल्कि युद्ध के बाद वह रणनीतिक रूप से अधिक मजबूत होकर उभरा है। तेहरान के पास मौजूद 450 किलो समृद्ध यूरेनियम का भंडार सुरक्षित है और उसका मिसाइल प्रोग्राम भी जस का तस बना हुआ है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान को टोल वसूलने का अधिकार मिल गया है, जो उसकी आर्थिक और सामरिक जीत मानी जा रही है।

इजरायल और वाशिंगटन के बीच बढ़ती दूरियां

इस समझौते ने अमेरिका और उसके सबसे करीबी सहयोगी इजरायल के बीच के मतभेदों को भी सार्वजनिक कर दिया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस युद्धविराम से खासे असंतुष्ट नजर आ रहे हैं, क्योंकि इजरायल ईरान के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह करना चाहता था। दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप पर घरेलू दबाव और अमेरिकी हथियारों के घटते भंडार (विशेषकर एयर डिफेंस इंटरसेप्टर्स) ने उन्हें समझौते के लिए मजबूर किया। ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों ने जिस तरह से खाड़ी देशों में पैठ बनाई, उसने क्षेत्र में 'सुरक्षा प्रदाता' के रूप में अमेरिका की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

समझौते का प्रभाव और भविष्य की राह

इस युद्धविराम का दीर्घकालिक प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीति पर पड़ना तय है। आईआरजीसी (IRGC) का ईरान की सरकार पर नियंत्रण पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है, जिससे भविष्य में पश्चिम को सीधे सैन्य कमांडरों से बात करनी होगी। खाड़ी देश अब सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपनी विदेश नीति में विविधता ला सकते हैं और चीन या रूस की ओर झुकाव बढ़ा सकते हैं। तेहरान में इस समय जश्न का माहौल है, जिसे वहां के नागरिक अपनी जिद और जुझारूपन की जीत के रूप में देख रहे हैं। यह घटनाक्रम संदेश देता है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत से नहीं बल्कि अडिग इरादों से भी जीते जाते हैं।

निष्कर्ष

ईरान और अमेरिका के बीच हुआ यह संघर्ष विराम केवल गोलियों का थमना नहीं है, बल्कि एक नए विश्व क्रम (New World Order) का संकेत है। जहां एक ओर अमेरिका ने अपने आर्थिक और सैन्य संसाधनों को बचाने के लिए समझौता किया, वहीं ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद खुद को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है। अब देखना यह होगा कि क्या यह शांति स्थायी रहती है या यह भविष्य के किसी और बड़े टकराव से पहले की खामोशी है। फिलहाल, कूटनीति की मेज पर तेहरान ने वाशिंगटन को अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर कर दिया है।

टिप्पणियाँ