इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: केवल संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, हत्या और लूट के मामले में अपील खारिज


इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: केवल संदेह के आधार पर नहीं दी जा सकती सजा, हत्या और लूट के मामले में अपील खारिज

प्रयागराज, एजेंसी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी करार नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने गौतमबुद्ध नगर के एक चर्चित लूट और हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए इसके खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) में घटनाओं की कड़ियां आपस में जुड़ी होनी चाहिए, जिसके अभाव में अभियोजन का पूरा मामला संदेह के दायरे में आ जाता है।

क्या था पूरा मामला और अदालती प्रक्रिया

यह मामला वर्ष 2012 का है, जो गौतमबुद्ध नगर के नोएडा फेज-दो थाना क्षेत्र से जुड़ा है। उस समय एक नहर के किनारे लोकेश नामक व्यक्ति का शव बरामद हुआ था। मृतक के परिजनों ने नरेंद्र कुमार और उसके साथियों पर लूट के बाद गला घोंटकर और पत्थर से वार कर हत्या करने का आरोप लगाया था। परिजनों का यह भी दावा था कि मृतक को आखिरी बार इन्हीं आरोपियों के साथ देखा गया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान सत्र अदालत ने सबूतों के अभाव और अभियोजन की कहानी को संदिग्ध मानते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मृतक के परिजन बृजेश कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अपील

न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार सिंह प्रथम की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि 'लास्ट सीन थ्योरी' (आखिरी बार साथ देखे जाने) का दावा करने वाले गवाहों की भूमिका संदेहास्पद है। कोर्ट ने गौर किया कि गवाहों ने घटना के कई दिनों बाद तक पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी, जो उनकी गवाही की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। इसके अतिरिक्त, शव मिलने के चार दिन बाद एफआईआर दर्ज कराने का कोई ठोस कारण भी पुलिस नहीं बता सकी।

साक्ष्य जुटाने में पुलिस की बड़ी लापरवाही

अदालत ने पुलिस द्वारा साक्ष्य संकलन में बरती गई लापरवाही पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि घटना स्थल से बरामद कपड़ों और पत्थरों को फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि उन पर लगा रक्त मानव का था या नहीं। वहीं, पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक ने भी यह संभावना जताई कि मृतक के शरीर पर लगी चोटें नहर में ऊंचाई से गिरने के कारण भी हो सकती हैं। साक्ष्यों के इन अभावों और लूट का मकसद साबित न हो पाने के कारण न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि ठोस साक्ष्यों के बिना किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता।

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