सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बताया सबसे बड़ा मुकदमेबाज, अदालती समय बर्बाद करने पर ठोका 25,000 का जुर्माना
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बताया सबसे बड़ा मुकदमेबाज, अदालती समय बर्बाद करने पर ठोका 25,000 का जुर्माना
नई दिल्ली, एजेंसी। देश की शीर्ष अदालत ने न्यायपालिका में लंबित मामलों के अंबार को लेकर केंद्र सरकार के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक हालिया सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को 'सबसे बड़ा मुकदमेबाज' करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालतों में मुकदमों की बढ़ती संख्या के लिए सरकार का रवैया काफी हद तक जिम्मेदार है क्योंकि सरकार छोटे और मामूली विवादों को भी अनावश्यक रूप से सुप्रीम कोर्ट तक खींच लाती है। इस दौरान पीठ ने सरकार पर भारी जुर्माना भी लगाया।
सीआईएसएफ कांस्टेबल की बर्खास्तगी से शुरू हुआ कानूनी विवाद
इस पूरे कानूनी मामले की जड़ केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के एक कांस्टेबल से जुड़ी है। संबंधित कांस्टेबल पर आरोप था कि वह बिना पूर्व सूचना के 11 दिनों तक अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित रहा। जांच में सामने आया कि वह अपने एक सहकर्मी की बेटी के विवाह समारोह में सहायता करने के लिए गया था। इस छोटी सी चूक के लिए विभाग ने उसे सेवा से बर्खास्त करने का कठोर निर्णय लिया था। जब यह विवाद पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय पहुंचा, तो वहां की अदालत ने इस सजा को अपराध की तुलना में अत्यधिक माना और विभाग को निर्देश दिया कि कांस्टेबल को सेवा में बहाल किया जाए और उसे 25 प्रतिशत पिछला वेतन भी प्रदान किया जाए।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची केंद्र सरकार
उच्च न्यायालय द्वारा कांस्टेबल को दी गई राहत को स्वीकार करने के स्थान पर केंद्र सरकार ने इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का विकल्प चुना। इसी कदम पर जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने गहरी नाराजगी व्यक्त की। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सरकारी पक्ष को टोकते हुए कहा कि एक तरफ देश में मुकदमों के बोझ की चर्चा होती है और दूसरी तरफ सरकार खुद छोटे-छोटे मामलों में अपील दायर कर अदालतों का बोझ बढ़ा रही है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या सरकारी तंत्र को यह आभास नहीं है कि महज 11 दिन की अनुपस्थिति पर किसी को नौकरी से निकाल देना न्यायसंगत नहीं है।
अनावश्यक अपील पर अदालत ने लगाया हर्जाना
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए इसे अदालत के कीमती समय की बर्बादी करार दिया। पीठ ने कड़ा संदेश देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार पर 25,000 रुपये का जुर्माना आरोपित किया। अदालत ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया कि जब उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों को देखते हुए उचित राहत प्रदान कर दी थी, तो ऐसी याचिकाओं के साथ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना अनुचित है। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी माना जा रहा है ताकि भविष्य में कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग अधिक जिम्मेदारी के साथ किया जाए।

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