High Court on Arms License: इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख, यूपी सरकार से मांगा हथियार लाइसेंसों का पूरा डेटा

High Court on Arms License: हथियार लाइसेंस में देरी और अपारदर्शिता पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा विस्तृत डेटा

प्रयागराज, एजेंसी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हथियार लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया और इसमें होने वाली अत्यधिक देरी को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने भदोही के एक मामले की सुनवाई करते हुए अपर मुख्य सचिव (गृह) को निर्देश दिया है कि वे प्रदेश में आर्म्स लाइसेंस की वर्तमान स्थिति, लंबित आवेदनों और सरकार की स्पष्ट नीति पर एक विस्तृत डिजिटल डेटा प्रस्तुत करें। कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि प्रशासनिक स्तर पर बिना किसी ठोस कारण के वर्षों तक आवेदनों को लटकाया जाता है और फिर बिना आधार बताए उन्हें खारिज कर दिया जाता है।

भदोही के व्यवसायी की याचिका पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप**

इस पूरे मामले की शुरुआत भदोही निवासी जय शंकर उर्फ बैरिस्टर की एक याचिका से हुई। याची, जो पेशे से स्वर्ण आभूषणों का व्यवसायी है, ने अपनी सुरक्षा के खतरे को देखते हुए साल 2018 में शस्त्र लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन को इस आवेदन पर निर्णय लेने में चार साल का समय लग गया और नवंबर 2022 में इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद जब याची ने मिर्जापुर मंडल के अपर आयुक्त के समक्ष अपील की, तो वहां भी तीन साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद नवंबर 2025 में बिना कोई कारण बताए उनकी अपील को ठुकरा दिया गया। 

अदालत में सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि उनके मुवक्किल का व्यवसाय जोखिम भरा है और सुरक्षा के लिए हथियार अनिवार्य है। हालांकि सरकारी वकील ने याची के खिलाफ दर्ज पांच आपराधिक मामलों का हवाला देते हुए लाइसेंस रद्द करने को सही ठहराया, लेकिन कोर्ट ने इस बात पर आपत्ति जताई कि प्रशासन ने आवेदन और अपील पर फैसला लेने में सात साल का समय क्यों लिया। कोर्ट ने जिलाधिकारी भदोही और अपीलीय प्राधिकारी से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर इस देरी का कारण स्पष्ट करने को कहा है।

शस्त्र लाइसेंस प्रक्रिया में पारदर्शिता और डिजिटल डेटाबेस की मांग**

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इसे केवल एक व्यक्ति की याचिका तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरे राज्य की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा है कि क्या उत्तर प्रदेश में आर्म्स लाइसेंस देने के लिए कोई पारदर्शी और स्पष्ट नीति मौजूद है? कोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि क्या राज्य के पास शस्त्र लाइसेंसों का कोई केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस है, जिससे यह पता चल सके कि किस जिले में कितने लाइसेंस जारी किए गए हैं और कितने आवेदन लंबित हैं।

हाईकोर्ट ने सभी जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों को निर्देश दिया है कि वे जिलेवार और थानेवार लाइसेंसों का पूरा विवरण तैयार करें। इसमें विशेष रूप से यह जानकारी मांगी गई है कि एक ही परिवार में कितने सदस्यों के पास शस्त्र लाइसेंस हैं। साथ ही, कोर्ट ने उन लाइसेंस धारकों की अलग सूची बनाने का आदेश दिया है जिनके खिलाफ दो या दो से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट का मानना है कि प्रशासनिक बाधाओं और स्पष्ट नियमों के अभाव के कारण ही पात्र लोगों को लाइसेंस मिलने में देरी होती है, जबकि रसूखदार लोग नियमों का लाभ उठा लेते हैं।

शक्ति प्रदर्शन और सामाजिक भय पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी**

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू पर भी प्रकाश डाला। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्तमान समय में हथियार रखना आत्मरक्षा से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन और सामाजिक रसूख का प्रतीक बन गया है। लोग हथियारों का उपयोग कानून के डर के बजाय समाज में अपना दबदबा कायम करने के लिए कर रहे हैं। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ तस्वीरें साझा करना और राजनीतिक रैलियों में इनका प्रदर्शन करना आम हो गया है, जो आम जनता के मन में भय पैदा करता है। 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शस्त्र लाइसेंस आत्मरक्षा के लिए एक विशेष अधिकार है, न कि सार्वजनिक प्रदर्शन या डराने-धमकाने का जरिया। राजनीतिक प्रभाव के चलते हथियार हासिल करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के संकेत देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह कानून के शासन के विरुद्ध है। इसी कारण अदालत ने आपराधिक इतिहास वाले व्यक्तियों के पास मौजूद लाइसेंसों की समीक्षा करने का कड़ा निर्देश दिया है, ताकि समाज में सुरक्षा का वातावरण बना रहे।

प्रशासनिक जवाबदेही और भविष्य के संभावित प्रभाव**

हाईकोर्ट के इस सख्त आदेश की प्रति राज्य के सभी जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भेज दी गई है। इस आदेश का दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश सरकार को अपनी आर्म्स पॉलिसी में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। डिजिटल डेटाबेस बनने से न केवल प्रक्रिया में तेजी आएगी, बल्कि भ्रष्टाचार और पक्षपात की गुंजाइश भी कम होगी। अब प्रशासनिक अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे आवेदनों पर समयबद्ध सीमा के भीतर निर्णय लें और यदि आवेदन खारिज किया जाता है, तो उसके पीछे के वैधानिक कारणों को स्पष्ट रूप से दर्ज करें।

इस मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल 2026 को तय की गई है। तब तक शासन को कोर्ट द्वारा मांगी गई सभी जानकारियों और आंकड़ों को प्रस्तुत करना होगा। यदि सरकार कोर्ट को संतुष्ट करने वाली नीति पेश नहीं कर पाती है, तो अदालत खुद भी दिशा-निर्देश जारी कर सकती है। यह मामला उन हजारों आवेदकों के लिए उम्मीद की किरण है जिनके आवेदन सालों से फाइलों में दबे हुए हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख प्रशासन की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। हथियार लाइसेंस की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाकर ही 'लाठी उसकी भैंस' वाली संस्कृति पर लगाम लगाई जा सकती है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आत्मरक्षा का अधिकार और प्रशासनिक कर्तव्य दोनों ही नियमों के दायरे में होने चाहिए। अब 28 अप्रैल की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं, जो उत्तर प्रदेश में शस्त्र लाइसेंस की भविष्य की राह तय करेगी।

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