Typhoid Crisis in India: मियादी बुखार का इलाज बना आर्थिक बोझ, 70 हजार परिवार हुए कर्जदार; देश को अरबों का नुकसान
Typhoid Crisis in India: मियादी बुखार का इलाज बना आर्थिक बोझ, 70 हजार परिवार हुए कर्जदार; देश को अरबों का नुकसान
नई दिल्ली, एजेंसी। भारत में मियादी बुखार यानी टाइफाइड अब केवल एक स्वास्थ्य समस्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के हजारों परिवारों के लिए एक गहरे आर्थिक संकट का रूप ले चुका है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। इस शोध के अनुसार, टाइफाइड के कारण भारत को प्रतिवर्ष लगभग 12,300 करोड़ रुपये का भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस कुल आर्थिक बोझ का 91 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर पीड़ित मरीजों और उनके परिवारों की जेब से खर्च हो रहा है, जिससे उनकी संचित पूंजी समाप्त हो रही है।
इलाज के इस बेतहाशा खर्च ने देश के लगभग 70 हजार से अधिक परिवारों को 'कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ कॉस्ट' (विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय) की स्थिति में धकेल दिया है। तकनीकी भाषा में इसका अर्थ यह है कि ये परिवार अपनी कुल वार्षिक आय का 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा केवल टाइफाइड के इलाज पर खर्च करने को मजबूर हैं। इस भारी वित्तीय दबाव के कारण इन परिवारों के पास भोजन, शिक्षा और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं बच रहे हैं, जिससे वे कर्ज के दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं।
द लैंसेट की रिपोर्ट में खुलासा और एंटीबायोटिक का बढ़ता बेअसर होना
प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट रीजनल हेल्थ: साउथईस्ट एशिया' में प्रकाशित यह शोध इस बीमारी की अंतरराष्ट्रीय गंभीरता को भी दर्शाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, मियादी बुखार का सबसे घातक प्रभाव 10 साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ रहा है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि टाइफाइड के आधे से अधिक मामले मुख्य रूप से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से सामने आ रहे हैं। इसमें भी शहरी क्षेत्रों की स्थिति अधिक विकट है। एक बड़ी चुनौती 'एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स' (AMR) के रूप में उभरी है। टाइफाइड के उपचार में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाएं अब संक्रमण पर बेअसर साबित हो रही हैं। दवाओं के प्रति इस बढ़ते प्रतिरोध के कारण इलाज की जटिलता और खर्च में 87 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्ष 2023 के आंकड़े और बच्चों पर बढ़ता खतरा
जनवरी 2026 में सामने आए एक अन्य महत्वपूर्ण अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023 के दौरान भारत में मियादी बुखार के कुल 49,30,326 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 7,850 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इन कुल मामलों का लगभग 29 प्रतिशत बोझ अकेले दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों पर रहा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पांच से नौ साल की उम्र के बच्चों में संक्रमण और दवा-प्रतिरोधी मामले सबसे अधिक देखे गए हैं। वहीं, छह महीने से चार साल तक के छोटे बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने की दर और मृत्यु का जोखिम अन्य आयु वर्गों की तुलना में कहीं अधिक रहा। आंकड़ों के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के करीब 3.21 लाख बच्चों को गंभीर स्थिति के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जो स्वास्थ्य व्यवस्था और घरेलू बजट दोनों पर गहरा असर डाल रहा है।

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