मुख्तार अंसारी हमला केस: बृजेश सिंह समेत पांच आरोपी बरी, कोर्ट में 22 साल पुराना मामला नहीं हुआ साबित

मुख्तार अंसारी हमला केस: बृजेश सिंह समेत पांच आरोपी बरी, कोर्ट में 22 साल पुराना मामला नहीं हुआ साबित

लखनऊ, एजेंसी। उत्तर प्रदेश के चर्चित मुख्तार अंसारी हमला मामले में लखनऊ की एमपी-एमएलए कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह समेत पांच आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। करीब 22 वर्ष पुराने इस मामले में अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा, जिसके चलते सभी आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया।

अदालत का फैसला और क्या कहा न्यायाधीश ने

राजधानी लखनऊ स्थित विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट के न्यायाधीश हरबंस नारायण ने देर शाम करीब साढ़े छह बजे अपना फैसला सुनाया। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि प्रस्तुत साक्ष्य और गवाह आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इस आधार पर बृजेश सिंह, त्रिभुवन सिंह, आनंद राय, सुनील राय और अजय सिंह को बरी किया जाता है।

सुनवाई के दौरान बृजेश सिंह, आनंद राय और सुनील राय व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए, जबकि अन्य दो आरोपी त्रिभुवन सिंह और अजय सिंह को संबंधित जेलों से पुलिस सुरक्षा के बीच पेश किया गया।

2004 में दर्ज हुआ था मामला

इस मामले की शुरुआत 13 जनवरी 2004 को हुई थी, जब मऊ से विधायक रहे मुख्तार अंसारी ने लखनऊ के कैंट थाने में जानलेवा हमले की एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में उन्होंने बताया था कि वह अपने परिवार के साथ कार से जा रहे थे, तभी कैंटोमेंट क्षेत्र में उन पर हमला हुआ।

हमले का आरोप और घटना का विवरण

एफआईआर के अनुसार, आरोप लगाया गया था कि हमलावर पहले से घात लगाकर मौजूद थे और हथियारों से लैस होकर उन्होंने कार से उतरकर फायरिंग शुरू कर दी। इसमें रायफल, एके-47 और अन्य हथियारों के इस्तेमाल की बात कही गई थी।

घटना के दौरान मुख्तार अंसारी और उनके परिवार के लोग अपनी जान बचाने के लिए वाहन से उतरकर छिप गए थे। वहीं दूसरी गाड़ी में मौजूद उनके परिचितों ने हमलावरों को पहचानने का दावा किया था।

दोनों पक्षों ने दर्ज कराई थी एफआईआर

इस घटना के बाद एक अन्य प्राथमिकी भी दर्ज हुई थी, जिसमें तत्कालीन विधायक कृष्णानंद राय ने मुख्तार अंसारी के खिलाफ हत्या के प्रयास का आरोप लगाया था। हालांकि, पुलिस जांच के बाद उस मामले में अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई थी।

चार्जशीट और जांच की प्रक्रिया

पुलिस ने जांच के दौरान सबसे पहले वर्ष 2004 में कुछ आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद वर्ष 2006 में अन्य आरोपियों को भी मामले में शामिल करते हुए उनके खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल किया गया।

लंबी कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई के बाद आखिरकार अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसके चलते सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया।

फैसले के मायने और कानूनी पहलू

यह फैसला प्रदेश की राजनीति और आपराधिक मामलों के इतिहास में अहम माना जा रहा है। लंबे समय से चल रहे इस केस में सबूतों की कमी और गवाहों की पुष्टि न हो पाने के कारण अदालत ने आरोपियों को राहत दी है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के पुराने मामलों में साक्ष्य जुटाना और उन्हें अदालत में प्रमाणित करना एक बड़ी चुनौती होती है, जिसका असर फैसलों पर साफ दिखाई देता है।

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