नवरात्रि 2026 कन्या पूजन: जानें कन्याओं की सही संख्या, उम्र और पूजन की संपूर्ण विधि


नवरात्रि 2026 कन्या पूजन: जानें कन्याओं की सही संख्या, उम्र और पूजन की संपूर्ण विधि

मेरठ (यूपी आज लाइव टीम)।  चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्रि के अंतिम दो दिनों, अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मान्यताओं के अनुसार, छोटी कन्याएं साक्षात मां भगवती का स्वरूप होती हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में अक्सर कन्याओं की संख्या और उनकी आयु को लेकर जिज्ञासा रहती है। ज्योतिषाचार्य पं. राकेश झा से जानिए कन्या पूजन के शास्त्रोक्त नियम।

कन्या पूजन के लिए कितनी होनी चाहिए कन्याओं की संख्या?

शास्त्रों के अनुसार, कन्या पूजन के लिए 9 कन्याओं को आमंत्रित करना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि वे मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। हालांकि, यदि किन्हीं कारणों से 9 कन्याएं उपलब्ध न हों, तो विषम संख्या जैसे 3, 5 या 7 कन्याओं का पूजन भी किया जा सकता है। यदि विषम संख्या में भी कन्याएं न मिलें, तो पूरी श्रद्धा के साथ एक कन्या का पूजन करने से भी मां प्रसन्न होती हैं और पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। विशेष ध्यान रखें कि कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी आमंत्रित किया जाता है, जिन्हें बटुक भैरव का रूप माना जाता है।

आयु का महत्व: 2 से 10 वर्ष की कन्याएं सर्वश्रेष्ठ

कन्या पूजन के लिए कन्या की आयु का विशेष महत्व है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, 2 से 10 वर्ष तक की आयु की कन्याओं का पूजन करना फलदायी होता है। आयु के अनुसार उनके स्वरूप इस प्रकार माने गए हैं:

2 वर्ष: कुमारी

3 वर्ष: त्रिमूर्ति

4 वर्ष: कल्याणी

5 वर्ष: रोहिणी

6 वर्ष: कालिका

7 वर्ष: चंडिका

8 वर्ष: शांभवी

9 वर्ष: दुर्गा

10 वर्ष: सुभद्रा

अष्टमी और नवमी पर पूजन की सही विधि

कन्या पूजन को विधि-विधान से करने पर ही माता की कृपा प्राप्त होती है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:

आमंत्रण: सबसे पहले कन्याओं को आदर सहित अपने घर पर आमंत्रित करें।

चरण प्रक्षालन: घर प्रवेश पर कन्याओं के पैर धोएं और उन्हें स्वच्छ आसन पर बैठाएं।

तिलक व रक्षासूत्र: सभी कन्याओं के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाएं और उनके दाहिने हाथ में रक्षासूत्र (कलावा) बांधें।

भोग: कन्याओं को श्रद्धापूर्वक सात्विक भोजन कराएं, जिसमें मुख्य रूप से हलवा, पूड़ी और काले चने शामिल होने चाहिए।

उपहार व दक्षिणा: भोजन के उपरांत अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल, वस्त्र, उपहार या दक्षिणा भेंट करें।

आशीर्वाद: अंत में सभी कन्याओं के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और माता के जयकारे लगाते हुए उन्हें विदा करें।

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